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Tuesday, April 21, 2020

मोदी ने 5 महीने में कोई विदेश यात्रा नहीं की, 6 साल में दूसरी बार ऐसा; 29 फरवरी से तो दिल्ली से बाहर भी नहीं गए

कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए दुनियाभर की सरकारें लॉकडाउन का तरीका अपना रही हैं। भारत में भी40 दिन का लॉकडाउन है, जिसका आज 29वां दिन है। पिछले करीब एक महीने से देश की 135 करोड़ की आबादी घर में कैद है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से सिर्फ आम लोग ही नहीं, जो कहीं आ-जा नहीं पा रहे। बल्कि, प्रधानमंत्री मोदी भी कहीं आ-जा नहीं पा रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी को विदेश से लौटे आज 5 महीने, 6 दिन हो चुके हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 6 साल में ये दूसरी बार है, जब वे इतने लंबे समय तक देश में ही हैं।

इससे पहले मोदी ने 2016-17 में 6 महीने तक कोई विदेश यात्रा नहीं की थी। उस समय मोदी 12 नवंबर 2016 को जापान से लौटे थे और उसके बाद 11 मई 2017 को श्रीलंका के दौरे पर गए थे। हालांकि, उस समय देश में चुनाव भी थे। मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में चुनाव हुए थे।
हर साल 10 से ज्यादा विदेशी यात्राएं करते हैं मोदी
मोदी को प्रधानमंत्री बने करीब 5 साल 11 महीने हो चुके हैं। मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार और 30 मई 2019 को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 2014 से लेकर अब तक 59 बार विदेश के लिए रवाना हुए हैं। इस दौरान उन्होंने 106 देश (इनमें 2 या उससे ज्यादा दौरे भी) की यात्रा की है। मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, तब से हर साल 10 से ज्यादा विदेशी यात्राएं करते हैं।
दिसंबर 2018 में राज्यसभा में दिए जवाब में उस समय के विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री के विदेश दौरे पर होने वाले खर्च का ब्योरा दिया था। इसके मुताबिक, 2018-19 तक मोदी की विदेश यात्रा पर 2,021.54 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इसके बाद मोदी ने 14 यात्राएं और कीं, जिसमें 90.70 करोड़ रुपए और खर्च हुए थे। हालांकि, इस खर्चमें प्रधानमंत्री के विमान के रखरखाव और हॉटलाइन का खर्चशामिल नहीं था।

2017 में 5 राज्यों में चुनाव थे, इस बीच 6 महीने तक मोदी विदेश नहीं गए थे
नवंबर 2016 से मई 2017 के बीच प्रधानमंत्री मोदी किसी भी विदेश दौरे पर नहीं गए थे। इसका एक कारण ये भी था कि, उस समय उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव भी थे। इन 5 राज्यों में मोदी ने नवंबर 2016 से लेकर मार्च 2017 के बीच 38 दौरे किए थे। इसमें से सबसे ज्यादा 27 दौरे अकेले उत्तर प्रदेश में किए थे। चुनाव में भाजपा ने यहां की 403 सीटों में से 325 सीटें जीती थीं। भाजपा 5 में से 4 राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही थी। अकेले पंजाब में उसे सरकार गंवानी पड़ी थी।

मोदी हर साल राज्यों के दौरे पर भी जाते हैं, लेकिन 29 फरवरी से दिल्ली में ही हैं
प्रधानमंत्री मोदी आखिरी बार दिल्ली से बाहर 29 फरवरी को गए थे। इस दिन वे उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और मध्य प्रदेश के चित्रकूट आए थे। प्रयागराज में वे सामाजिक आधिकारिता शिविर में शामिल हुए थे। जबकि, चित्रकूट में बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे का शिलान्यास करने और किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड बांटने गए थे।

भास्कर नॉलेज : चौधरी चरण सिंह ऐसे प्रधानमंत्री, जो किसी विदेशी दौरे पर नहीं गए

पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 68 देशों की यात्रा की थी। वे 1947 से 1962 तक प्रधानमंत्री रहे थे। उनकी पहली विदेश यात्रा 11 से 15 अक्टूबर 1949 को हुई थी। पहली विदेश यात्रा पर नेहरू अमेरिका गए थे।

इंदिरा गांधी ने 15 साल के दौरान 116 देशों की यात्राएं की थीं।

5वें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह (28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक) ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने एक भी विदेशी दौरा नहीं किया था।

अटल बिहारी वाजपेयी ने 48 देशों की यात्रा की थी।

डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में 93 देशों की यात्रा की थी।

आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें

Modi did not travel abroad in 5 months, for the second time in 6 years; Since 29 February, I did not even go out of Delhi

source https://www.bhaskar.com/db-original/news/modi-did-not-travel-abroad-in-5-months-for-the-second-time-in-6-years-since-29-february-i-did-not-even-go-out-of-delhi-127217442.html

मोदी ने 5 महीने में कोई विदेश यात्रा नहीं की, 6 साल में दूसरी बार ऐसा; 29 फरवरी से तो दिल्ली से बाहर भी नहीं गए कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए दुनियाभर की सरकारें लॉकडाउन का तरीका अपना रही हैं। भारत में भी40 दिन का लॉकडाउन है, जिसका आज 29वां दिन है। पिछले करीब एक महीने से देश की 135 करोड़ की आबादी घर में कैद है। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से सिर्फ आम लोग ही नहीं, जो कहीं आ-जा नहीं पा रहे। बल्कि, प्रधानमंत्री मोदी भी कहीं आ-जा नहीं पा रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी को विदेश से लौटे आज 5 महीने, 6 दिन हो चुके हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद 6 साल में ये दूसरी बार है, जब वे इतने लंबे समय तक देश में ही हैं। इससे पहले मोदी ने 2016-17 में 6 महीने तक कोई विदेश यात्रा नहीं की थी। उस समय मोदी 12 नवंबर 2016 को जापान से लौटे थे और उसके बाद 11 मई 2017 को श्रीलंका के दौरे पर गए थे। हालांकि, उस समय देश में चुनाव भी थे। मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश समेत 5 राज्यों में चुनाव हुए थे। हर साल 10 से ज्यादा विदेशी यात्राएं करते हैं मोदी मोदी को प्रधानमंत्री बने करीब 5 साल 11 महीने हो चुके हैं। मोदी ने 26 मई 2014 को पहली बार और 30 मई 2019 को दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक, मोदी ने 2014 से लेकर अब तक 59 बार विदेश के लिए रवाना हुए हैं। इस दौरान उन्होंने 106 देश (इनमें 2 या उससे ज्यादा दौरे भी) की यात्रा की है। मोदी जब से प्रधानमंत्री बने हैं, तब से हर साल 10 से ज्यादा विदेशी यात्राएं करते हैं। दिसंबर 2018 में राज्यसभा में दिए जवाब में उस समय के विदेश राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह ने प्रधानमंत्री के विदेश दौरे पर होने वाले खर्च का ब्योरा दिया था। इसके मुताबिक, 2018-19 तक मोदी की विदेश यात्रा पर 2,021.54 करोड़ रुपए खर्च हुए थे। इसके बाद मोदी ने 14 यात्राएं और कीं, जिसमें 90.70 करोड़ रुपए और खर्च हुए थे। हालांकि, इस खर्चमें प्रधानमंत्री के विमान के रखरखाव और हॉटलाइन का खर्चशामिल नहीं था। 2017 में 5 राज्यों में चुनाव थे, इस बीच 6 महीने तक मोदी विदेश नहीं गए थे नवंबर 2016 से मई 2017 के बीच प्रधानमंत्री मोदी किसी भी विदेश दौरे पर नहीं गए थे। इसका एक कारण ये भी था कि, उस समय उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव भी थे। इन 5 राज्यों में मोदी ने नवंबर 2016 से लेकर मार्च 2017 के बीच 38 दौरे किए थे। इसमें से सबसे ज्यादा 27 दौरे अकेले उत्तर प्रदेश में किए थे। चुनाव में भाजपा ने यहां की 403 सीटों में से 325 सीटें जीती थीं। भाजपा 5 में से 4 राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही थी। अकेले पंजाब में उसे सरकार गंवानी पड़ी थी। मोदी हर साल राज्यों के दौरे पर भी जाते हैं, लेकिन 29 फरवरी से दिल्ली में ही हैं प्रधानमंत्री मोदी आखिरी बार दिल्ली से बाहर 29 फरवरी को गए थे। इस दिन वे उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और मध्य प्रदेश के चित्रकूट आए थे। प्रयागराज में वे सामाजिक आधिकारिता शिविर में शामिल हुए थे। जबकि, चित्रकूट में बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे का शिलान्यास करने और किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड बांटने गए थे। भास्कर नॉलेज : चौधरी चरण सिंह ऐसे प्रधानमंत्री, जो किसी विदेशी दौरे पर नहीं गए पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 68 देशों की यात्रा की थी। वे 1947 से 1962 तक प्रधानमंत्री रहे थे। उनकी पहली विदेश यात्रा 11 से 15 अक्टूबर 1949 को हुई थी। पहली विदेश यात्रा पर नेहरू अमेरिका गए थे। इंदिरा गांधी ने 15 साल के दौरान 116 देशों की यात्राएं की थीं। 5वें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह (28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक) ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने एक भी विदेशी दौरा नहीं किया था। अटल बिहारी वाजपेयी ने 48 देशों की यात्रा की थी। डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने 10 साल के कार्यकाल में 93 देशों की यात्रा की थी। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें Modi did not travel abroad in 5 months, for the second time in 6 years; Since 29 February, I did not even go out of Delhi source https://www.bhaskar.com/db-original/news/modi-did-not-travel-abroad-in-5-months-for-the-second-time-in-6-years-since-29-february-i-did-not-even-go-out-of-delhi-127217442.html

April 21, 2020 0 Comments
मोदी ने 5 महीने में कोई विदेश यात्रा नहीं की, 6 साल में दूसरी बार ऐसा; 29 फरवरी से तो दिल्ली से बाहर भी नहीं गए कोरोनावायरस को फैलने से रो...
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किसी ने कमरा किराए से लिया, तो किसी ने होटल को ही घर बनाया, सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम पर लगी रहती हैं ये वीरांगनाएं

वो घर भी संभाल रही हैं औरड्यूटी भी निभा रही हैं। उन्हें अपने बच्चों की दिन-रात फ्रिक भी हैऔरकर्तव्य का अहसास भी। उनकी जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होतीहै, जो रात में 12 बजे तक चलतीहै। इस दौरान ड्यूटी के साथ ही घर के भी तमाम काम उन्हें करना होते हैं। घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों को पूरा कर रही इन वीरांगनाओं में सेकिसी ने खुद और परिवार को सुरक्षित रखने के लिएकिराए से कमरा लिया है तो किसी ने परिवार से दूरी ही बना ली। आज हम ऐसीही महिला पुलिसकर्मियों की कहानी सुना रहे हैं,जो खाकी वर्दी में न सिर्फ कोरोनावायरस को हराने में लगी हुई हैं, बल्कि इस मुश्किल दौर में अपने परिवार को भी संभाल रही हैं।

भोपाल में महिला पुलिसकर्मियों के संघर्ष को बयां करती पांच कहानियां...

ड्यूटी पर तैनात महिला पुलिसकर्मी।

1. शीला दांगी, थाना कोतवाली

आपका मौजूदा वक्त में घर में क्या रोल है?

मेरा दिन सुबह 6.30 बजे से शुरू होता है। पहले बच्चे को नहलाती हूं। तैयार करती हूं। फिर खुद नहाती हूं। इसके बाद पीने का पानी भरना, पति और खुद का टिफिन तैयार करना, घर की साफ-सफाई करने जैसे तमाम छोटे-मोटे काम निपटाने होते हैं। हसबैंड 9 बजे ऑफिस के लिए निकल जाते हैं। उससे पहले उनका टिफिन तैयार करना होता है। मेरा बच्चा अभी 5 साल का है। उसे अकेला घर में नहीं छोड़ सकते। रोज ड्यूटी पर आते वक्त बच्चे को पति के ऑफिस में छोड़ते हुए आती हूं,क्योंकि उन्हें फील्ड में नहीं जाना होता। वे ऑफिस में ही रहते हैं। मैं फील्ड और ऑफिस दोनों जगह काम करती हूं। कई लोगों से मिलती-जुलती हूं। इसलिए बच्चे को अपने साथ नहीं ला सकती। शाम को 7 बजे ड्यूटी खत्म होने के बाद बच्चे को हसबैंड के ऑफिस से लेते हुए घर जाती हूं। क्योंकि हसबैंड 9 बजे तक घर आते हैं। घर पहुंचकर खुद सैनिटाइज होती हूं फिर बच्चे को सैनिटाइज करती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। बच्चे के कपड़े वॉश करती हूं। फिर लग जाती हूं रात का खाना तैयार करने में। हसबैंड के आने के बाद हम साथ खाना खाते हैं। सोते-सोते 12 बजे जाते हैं। 6 घंटे बाद दोबारा उठने की फ्रिक के साथ कुछ घंटे सुकून की नींद लेने की कोशिश करते हैं। अगले दिन फिर वही रूटीन।

ड्यूटी पर क्या रोल होता है?
मैं कोतवाली थाने में कॉन्स्टेबल हूं। कभी फील्ड में ड्यूटी करनी होती है, कभी थाने में काम करना होता है। फील्ड पर रहते हैं तो इधर-उधर जाने वालों को रोकते हैं। समझाते हैं। मास्क पहनने को बोलते हैं। कई बार लोग हम पर चिढ़ भी जाते हैं। हमें ही डांटने लगते हैं, फिर भी हम रिक्वेस्ट करते हैं कि हम ये सब आपकी भलाई के लिए कर रहे हैं। कई दफा गुस्सा भी आता है। तब हम भी लोगों पर भड़क जाते हैं। पर मकसद तो यही होता है कि कोई कोरोना का शिकार न हो। भीड़ न जमा हो बस।

2. मीरा सिंह, 23 बटालियन

घर में आपका रोल क्या होता है?
मैं सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। क्योंकि 7 बजे मुझे ड्यूटी पर पहुंचना होता है। सुबह के दो घंटे बेहद व्यस्त होते हैं। नहाना, सफाई और खाना तैयार करना। मेरे दो बच्चे हैं। आठ साल का बेटा और तेरह साल की बेटी। दोनों पिता के साथ घर में रहते हैं। मैं खुद का टिफिन लेकर निकलती हूं। हमें भोजन तो उपलब्ध करवाया जा रहा, पर संक्रमण के डर से बाहर का खाना नहीं खाती। ड्यूटी खत्म होने पर पहले घर नहीं जाती। किराये का कमरा ले रखा है। वहां जाकर नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। तभी घर जाती हूं। हमें विभाग ने होटल में रहने की सुविधा दी है, पर होटल में रहने लगी तो बच्चे का घर पर ध्यान कौन रखेगा? उसे खाना-पीना कौन देगा? इसलिए जैसे कोरोनावायरस का मामला सामने आया हमने घर के पास ही किराये का एक कमरा ले लिया था। बच्चे और पति को सुरक्षित रखने के लिए ये जरूरी था।

और काम के दौरान आपका रोल क्या होता है?
हमारी ड्यूटी सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक चलती है। इस दौरान कई बार लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। जांच के लिए रोके जाने पर तो कई लोग धमकी देते हुए जाते हैं, कि देख लेंगे तुम्हें। महिलाएं बिना मास्क लगाए बच्चों को गाड़ी पर ले जाती हुई दिखती हैं, उन्हें रोको तो वो भी झगड़ पड़ती हैं। फील्ड पर रहने के दौरान लोगों के ऐसे बिहेवियर से कई बार गुस्सा भी आता है। लेकिन फिर लगता है कि सब तो परेशान ही हैं। हम हर किसी को समझाने का काम कर रहे हैं। तपती धूप में 8 घंटे तक खड़े रहना भी चुनौती है। हालांकि बीच-बीच में बैठ भी जाते हैं। छांव में भी चले जाते हैं, लेकिन लोगों को संभालना आसान नहीं होता। हर गाड़ी को चेक करना, समझाना, कागज देखना, मास्क पहनने को कहना, ये सब हमारी ड्यटी है।

3. सुमन सिंह, 23 बटालियन

अभी आप घर में क्या रोल अदा करती हैं?
मैं सरकारी क्वार्टर में रहती हूं। अभी घर पर अकेली ही हूं, क्योंकि मां और भाई लॉकडाउन के चलते गांव में फंस गए हैं। मैं लॉकडाउन के पहले आ गई थी। अकेले रहना ठीक भी है, लेकिन अकेले रहने की चुनौतियां भी हैं। ड्यूटी सुबह 7 बजे से शुरू होती है। इसलिए बजे उठहर खाना तैयार करती हूं। चाय और नाश्ता भी घर से ही बनाकर लाती हूं, क्योंकि बाहर तो कुछ मिल नहीं रहा। मां फोन करती रहती हैं। वो कई बार रोने लगती हैंकि कब खत्म होगा कोरोना। तुम ठीक हो कि नहीं। टेंशन में ही रहती हैं। मेरे पास आना चाहती हैं, लेकिन आ नहीं सकती। ड्यूटी से आने के बाद घर की सफाई करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। हर रोज कपड़े वॉश करती हूं। यूनिफॉर्म में प्रेस भी करना होता है। फिर डिनर तैयार करती हूं। सोते-सोते रात के 11 बज जाते हैं। अगली सुबह फिर से वही काम।

और बाहर क्या रोल रहता है?
मेरी ड्यूटी भोपाल चौराहे पर लगी है। चेकिंग में ड्यूटी है। दिनभर लोगों को समझाने और जांच करने में निकल जाता है। कई लोग सहयोग करते हैं और नियमों का पालन करते हैं। लेकिन कुछ लोग नियमों को नहीं मानते और हम पर ही गुस्सा निकालते हैं। ऐसे लोगों से भी डील करना होता है। जब से कोरोनावायरस आया है, तब से मन में डर भी हमेशा बना हुआ रहता है। फील्ड पर पूरे समय कपड़ा बांधकर ही रहते हैं। धूप में कपड़ा बांधकर खड़े होने से पसीना-पसीना हो जाते हैं, लेकिन कपड़ा हटा भी नहीं सकते, क्योंकि ऐसे में खतरा ज्यादा है। अभी जिंदगी बहुत चुनौतीपूर्ण चल रही है।

4. सोनम सूर्यवंशी, यातायात थाना

अभी घर में क्या रोल होता है?
मैं अकेले रहती हूं। सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक ड्यूटी रहती है। विभाग भोजन उपलब्ध करवा रहा है, पर मैं तो अपना खाना खुद बनाकर लाती हूं। ताकि संक्रमण का शिकार होने की रिस्क न रहे। सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। नहाने के बाद खाना बनाती हूं। 7 बजे तक ड्य्टी पर आ जाती हूं। दोपहर 3 बजे ड्यूटी के बाद घर जाती हूं। पहले खुद को सैनिटाइज करती हूं। नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। फिर घर की साफ-सफाई करके रात का खाना बनाती हूं। सोना साढ़े दस, ग्यारह बजे तक ही हो पाता है। मैंने पिछले साल ही पुलिस विभाग जॉइन किया है। मैं बैतूल की रहने वाली हूं। चिंता में घरवाले दिनभर फोन करके पूछते रहते हैं। उन्हें टेंशन रहता है कि मैं बाहर जा रही हूं। ड्यूटी पर हूं, ऐसे में किसी तरह का खतरा न हो।

और बाहर क्या रोल होता है?
26 मार्च से फील्ड ड्यूटी लगा दी गई थी। सब अलग-अलग प्वॉइंट पर चेकिंग कर रहे हैं। हमें देखना होता है कि, कौन-कहां जा रहा है। कोई फालतू तो नहीं घूम रहा। मैं मैथ्स से एमएससी करके पुलिस की फील्ड में आई हूं। लोगों को प्यार से समझाते हुए मैनेज कर लेती हूं। उन्हें बाहर निकलने के नुकसान और घर में रहने के फायदे बताती हूं। अधिकतर लोग समझ जाते हैं। कुछ लोग मिसबिहेव भी करते हैं। अब हम चालानी कार्रवाई भी शुरू कर चुके हैं। कुछ लोग अलग-अलग बहाने करके निकलने की कोशिश करते हैं। कोई कहता है पेट्रोल लेने जाना है, तो कोई कहता है राशन लेना है। हम सबसे यही रिक्वेक्ट कर रहे हैं कि घर से बाहर न निकलिए। आठ घंटे सड़क पर तपती धूप में नौकरी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। जब मौका मिलता है, तब थोड़ी देर के लिए बैठकर आराम कर लेते हैं।

5. पल्लवी शर्मा, एमपी नगर थाना

घर में क्या रोल होता है?

मैं सीहोर की रहने वाली हूं। भोपाल में घर-परिवार का कोई नहीं है। यहां विभाग ने होटल में रुकने की व्यवस्था की है। किसी को घर नहीं जाना है, सिर्फ लोकल में जिनके परिवार हैं, वहीं लोग घर जाते हैं। मैं होटल के कमरे में ही रहती हूं। खाना भी विभाग जो उपलब्ध करवाता है, वहीं खाती हूं। घरवाले बहुत टेंशन में हैं। वे बार-बार फोन करते हैं। चिंता करते हैं, लेकिन हमें इस कठिन समय में अपनी ड्यटी भी करना है। मां को बहुत टेंशन रहता है। वो दिन में कई बार कॉल करती हैं, लेकिन ड्यूटी मेरे लिए पहले है।

और बाहर क्या रोल होता है?
सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ड्यूटी पर रहती हूं। सबसे बड़ी चुनौती धूप में खड़े रहना ही है। एमपी नगर थाने के सामने वाले चौराहे पर मेरी ड्यूटी होती है। यह चौराहा भी थोड़ा ढलान में है, जिस कारण यहां पैर एकदम समतल नहीं होते। इस कारण रात में सोते वक्त बहुत दर्द देते हैं। हालांकि मैं अपने काम को बहुत एन्जॉय कर रही हूं। हम खाली सड़कों के फोटो लेते हैं। चाय पीते हुए सेल्फी लेते हैं। लोगों को प्यार से समझाते हैं। कई लोग चिढ़ते भी हैं। एक डॉक्टर साहब चिढ़ गए थे कि मैं यहां से रोज निकलता हूं, आप मुझे रोज रोकती हैं। अब हम किस-किस को पहचानें। हम लोगों को रोककर उनसे पूछताछ तो करना ही है। यही हमारा काम है।

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Somebody rented a room to sanitize themselves, then someone made the hotel a home, these enthusiasts keep on working from 5 am to 12 pm

source https://www.bhaskar.com/db-original/news/somebody-rented-a-room-to-sanitize-themselves-then-someone-made-the-hotel-a-home-these-enthusiasts-keep-on-working-from-5-am-to-12-pm-127214200.html

किसी ने कमरा किराए से लिया, तो किसी ने होटल को ही घर बनाया, सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम पर लगी रहती हैं ये वीरांगनाएं वो घर भी संभाल रही हैं औरड्यूटी भी निभा रही हैं। उन्हें अपने बच्चों की दिन-रात फ्रिक भी हैऔरकर्तव्य का अहसास भी। उनकी जिंदगी सुबह 5 बजे से शुरू होतीहै, जो रात में 12 बजे तक चलतीहै। इस दौरान ड्यूटी के साथ ही घर के भी तमाम काम उन्हें करना होते हैं। घर और बाहर दोनों की जिम्मेदारियों को पूरा कर रही इन वीरांगनाओं में सेकिसी ने खुद और परिवार को सुरक्षित रखने के लिएकिराए से कमरा लिया है तो किसी ने परिवार से दूरी ही बना ली। आज हम ऐसीही महिला पुलिसकर्मियों की कहानी सुना रहे हैं,जो खाकी वर्दी में न सिर्फ कोरोनावायरस को हराने में लगी हुई हैं, बल्कि इस मुश्किल दौर में अपने परिवार को भी संभाल रही हैं। भोपाल में महिला पुलिसकर्मियों के संघर्ष को बयां करती पांच कहानियां... ड्यूटी पर तैनात महिला पुलिसकर्मी। 1. शीला दांगी, थाना कोतवाली आपका मौजूदा वक्त में घर में क्या रोल है? मेरा दिन सुबह 6.30 बजे से शुरू होता है। पहले बच्चे को नहलाती हूं। तैयार करती हूं। फिर खुद नहाती हूं। इसके बाद पीने का पानी भरना, पति और खुद का टिफिन तैयार करना, घर की साफ-सफाई करने जैसे तमाम छोटे-मोटे काम निपटाने होते हैं। हसबैंड 9 बजे ऑफिस के लिए निकल जाते हैं। उससे पहले उनका टिफिन तैयार करना होता है। मेरा बच्चा अभी 5 साल का है। उसे अकेला घर में नहीं छोड़ सकते। रोज ड्यूटी पर आते वक्त बच्चे को पति के ऑफिस में छोड़ते हुए आती हूं,क्योंकि उन्हें फील्ड में नहीं जाना होता। वे ऑफिस में ही रहते हैं। मैं फील्ड और ऑफिस दोनों जगह काम करती हूं। कई लोगों से मिलती-जुलती हूं। इसलिए बच्चे को अपने साथ नहीं ला सकती। शाम को 7 बजे ड्यूटी खत्म होने के बाद बच्चे को हसबैंड के ऑफिस से लेते हुए घर जाती हूं। क्योंकि हसबैंड 9 बजे तक घर आते हैं। घर पहुंचकर खुद सैनिटाइज होती हूं फिर बच्चे को सैनिटाइज करती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। बच्चे के कपड़े वॉश करती हूं। फिर लग जाती हूं रात का खाना तैयार करने में। हसबैंड के आने के बाद हम साथ खाना खाते हैं। सोते-सोते 12 बजे जाते हैं। 6 घंटे बाद दोबारा उठने की फ्रिक के साथ कुछ घंटे सुकून की नींद लेने की कोशिश करते हैं। अगले दिन फिर वही रूटीन। ड्यूटी पर क्या रोल होता है? मैं कोतवाली थाने में कॉन्स्टेबल हूं। कभी फील्ड में ड्यूटी करनी होती है, कभी थाने में काम करना होता है। फील्ड पर रहते हैं तो इधर-उधर जाने वालों को रोकते हैं। समझाते हैं। मास्क पहनने को बोलते हैं। कई बार लोग हम पर चिढ़ भी जाते हैं। हमें ही डांटने लगते हैं, फिर भी हम रिक्वेस्ट करते हैं कि हम ये सब आपकी भलाई के लिए कर रहे हैं। कई दफा गुस्सा भी आता है। तब हम भी लोगों पर भड़क जाते हैं। पर मकसद तो यही होता है कि कोई कोरोना का शिकार न हो। भीड़ न जमा हो बस। 2. मीरा सिंह, 23 बटालियन घर में आपका रोल क्या होता है? मैं सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। क्योंकि 7 बजे मुझे ड्यूटी पर पहुंचना होता है। सुबह के दो घंटे बेहद व्यस्त होते हैं। नहाना, सफाई और खाना तैयार करना। मेरे दो बच्चे हैं। आठ साल का बेटा और तेरह साल की बेटी। दोनों पिता के साथ घर में रहते हैं। मैं खुद का टिफिन लेकर निकलती हूं। हमें भोजन तो उपलब्ध करवाया जा रहा, पर संक्रमण के डर से बाहर का खाना नहीं खाती। ड्यूटी खत्म होने पर पहले घर नहीं जाती। किराये का कमरा ले रखा है। वहां जाकर नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। तभी घर जाती हूं। हमें विभाग ने होटल में रहने की सुविधा दी है, पर होटल में रहने लगी तो बच्चे का घर पर ध्यान कौन रखेगा? उसे खाना-पीना कौन देगा? इसलिए जैसे कोरोनावायरस का मामला सामने आया हमने घर के पास ही किराये का एक कमरा ले लिया था। बच्चे और पति को सुरक्षित रखने के लिए ये जरूरी था। और काम के दौरान आपका रोल क्या होता है? हमारी ड्यूटी सुबह 7 से दोपहर 3 बजे तक चलती है। इस दौरान कई बार लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ता है। जांच के लिए रोके जाने पर तो कई लोग धमकी देते हुए जाते हैं, कि देख लेंगे तुम्हें। महिलाएं बिना मास्क लगाए बच्चों को गाड़ी पर ले जाती हुई दिखती हैं, उन्हें रोको तो वो भी झगड़ पड़ती हैं। फील्ड पर रहने के दौरान लोगों के ऐसे बिहेवियर से कई बार गुस्सा भी आता है। लेकिन फिर लगता है कि सब तो परेशान ही हैं। हम हर किसी को समझाने का काम कर रहे हैं। तपती धूप में 8 घंटे तक खड़े रहना भी चुनौती है। हालांकि बीच-बीच में बैठ भी जाते हैं। छांव में भी चले जाते हैं, लेकिन लोगों को संभालना आसान नहीं होता। हर गाड़ी को चेक करना, समझाना, कागज देखना, मास्क पहनने को कहना, ये सब हमारी ड्यटी है। 3. सुमन सिंह, 23 बटालियन अभी आप घर में क्या रोल अदा करती हैं? मैं सरकारी क्वार्टर में रहती हूं। अभी घर पर अकेली ही हूं, क्योंकि मां और भाई लॉकडाउन के चलते गांव में फंस गए हैं। मैं लॉकडाउन के पहले आ गई थी। अकेले रहना ठीक भी है, लेकिन अकेले रहने की चुनौतियां भी हैं। ड्यूटी सुबह 7 बजे से शुरू होती है। इसलिए बजे उठहर खाना तैयार करती हूं। चाय और नाश्ता भी घर से ही बनाकर लाती हूं, क्योंकि बाहर तो कुछ मिल नहीं रहा। मां फोन करती रहती हैं। वो कई बार रोने लगती हैंकि कब खत्म होगा कोरोना। तुम ठीक हो कि नहीं। टेंशन में ही रहती हैं। मेरे पास आना चाहती हैं, लेकिन आ नहीं सकती। ड्यूटी से आने के बाद घर की सफाई करती हूं। खुद को सैनिटाइज करती हूं। हर रोज कपड़े वॉश करती हूं। यूनिफॉर्म में प्रेस भी करना होता है। फिर डिनर तैयार करती हूं। सोते-सोते रात के 11 बज जाते हैं। अगली सुबह फिर से वही काम। और बाहर क्या रोल रहता है? मेरी ड्यूटी भोपाल चौराहे पर लगी है। चेकिंग में ड्यूटी है। दिनभर लोगों को समझाने और जांच करने में निकल जाता है। कई लोग सहयोग करते हैं और नियमों का पालन करते हैं। लेकिन कुछ लोग नियमों को नहीं मानते और हम पर ही गुस्सा निकालते हैं। ऐसे लोगों से भी डील करना होता है। जब से कोरोनावायरस आया है, तब से मन में डर भी हमेशा बना हुआ रहता है। फील्ड पर पूरे समय कपड़ा बांधकर ही रहते हैं। धूप में कपड़ा बांधकर खड़े होने से पसीना-पसीना हो जाते हैं, लेकिन कपड़ा हटा भी नहीं सकते, क्योंकि ऐसे में खतरा ज्यादा है। अभी जिंदगी बहुत चुनौतीपूर्ण चल रही है। 4. सोनम सूर्यवंशी, यातायात थाना अभी घर में क्या रोल होता है? मैं अकेले रहती हूं। सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक ड्यूटी रहती है। विभाग भोजन उपलब्ध करवा रहा है, पर मैं तो अपना खाना खुद बनाकर लाती हूं। ताकि संक्रमण का शिकार होने की रिस्क न रहे। सुबह 5 बजे उठ जाती हूं। नहाने के बाद खाना बनाती हूं। 7 बजे तक ड्य्टी पर आ जाती हूं। दोपहर 3 बजे ड्यूटी के बाद घर जाती हूं। पहले खुद को सैनिटाइज करती हूं। नहाती हूं। यूनिफॉर्म वॉश करती हूं। फिर घर की साफ-सफाई करके रात का खाना बनाती हूं। सोना साढ़े दस, ग्यारह बजे तक ही हो पाता है। मैंने पिछले साल ही पुलिस विभाग जॉइन किया है। मैं बैतूल की रहने वाली हूं। चिंता में घरवाले दिनभर फोन करके पूछते रहते हैं। उन्हें टेंशन रहता है कि मैं बाहर जा रही हूं। ड्यूटी पर हूं, ऐसे में किसी तरह का खतरा न हो। और बाहर क्या रोल होता है? 26 मार्च से फील्ड ड्यूटी लगा दी गई थी। सब अलग-अलग प्वॉइंट पर चेकिंग कर रहे हैं। हमें देखना होता है कि, कौन-कहां जा रहा है। कोई फालतू तो नहीं घूम रहा। मैं मैथ्स से एमएससी करके पुलिस की फील्ड में आई हूं। लोगों को प्यार से समझाते हुए मैनेज कर लेती हूं। उन्हें बाहर निकलने के नुकसान और घर में रहने के फायदे बताती हूं। अधिकतर लोग समझ जाते हैं। कुछ लोग मिसबिहेव भी करते हैं। अब हम चालानी कार्रवाई भी शुरू कर चुके हैं। कुछ लोग अलग-अलग बहाने करके निकलने की कोशिश करते हैं। कोई कहता है पेट्रोल लेने जाना है, तो कोई कहता है राशन लेना है। हम सबसे यही रिक्वेक्ट कर रहे हैं कि घर से बाहर न निकलिए। आठ घंटे सड़क पर तपती धूप में नौकरी करना किसी चुनौती से कम नहीं होता। जब मौका मिलता है, तब थोड़ी देर के लिए बैठकर आराम कर लेते हैं। 5. पल्लवी शर्मा, एमपी नगर थाना घर में क्या रोल होता है? मैं सीहोर की रहने वाली हूं। भोपाल में घर-परिवार का कोई नहीं है। यहां विभाग ने होटल में रुकने की व्यवस्था की है। किसी को घर नहीं जाना है, सिर्फ लोकल में जिनके परिवार हैं, वहीं लोग घर जाते हैं। मैं होटल के कमरे में ही रहती हूं। खाना भी विभाग जो उपलब्ध करवाता है, वहीं खाती हूं। घरवाले बहुत टेंशन में हैं। वे बार-बार फोन करते हैं। चिंता करते हैं, लेकिन हमें इस कठिन समय में अपनी ड्यटी भी करना है। मां को बहुत टेंशन रहता है। वो दिन में कई बार कॉल करती हैं, लेकिन ड्यूटी मेरे लिए पहले है। और बाहर क्या रोल होता है? सुबह 10 से शाम 6 बजे तक ड्यूटी पर रहती हूं। सबसे बड़ी चुनौती धूप में खड़े रहना ही है। एमपी नगर थाने के सामने वाले चौराहे पर मेरी ड्यूटी होती है। यह चौराहा भी थोड़ा ढलान में है, जिस कारण यहां पैर एकदम समतल नहीं होते। इस कारण रात में सोते वक्त बहुत दर्द देते हैं। हालांकि मैं अपने काम को बहुत एन्जॉय कर रही हूं। हम खाली सड़कों के फोटो लेते हैं। चाय पीते हुए सेल्फी लेते हैं। लोगों को प्यार से समझाते हैं। कई लोग चिढ़ते भी हैं। एक डॉक्टर साहब चिढ़ गए थे कि मैं यहां से रोज निकलता हूं, आप मुझे रोज रोकती हैं। अब हम किस-किस को पहचानें। हम लोगों को रोककर उनसे पूछताछ तो करना ही है। यही हमारा काम है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें Somebody rented a room to sanitize themselves, then someone made the hotel a home, these enthusiasts keep on working from 5 am to 12 pm source https://www.bhaskar.com/db-original/news/somebody-rented-a-room-to-sanitize-themselves-then-someone-made-the-hotel-a-home-these-enthusiasts-keep-on-working-from-5-am-to-12-pm-127214200.html

April 21, 2020 0 Comments
किसी ने कमरा किराए से लिया, तो किसी ने होटल को ही घर बनाया, सुबह 5 से रात 12 बजे तक काम पर लगी रहती हैं ये वीरांगनाएं वो घर भी संभाल रही ह...
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शोपियां में आज दो आतंकी एनकाउंटर में ढेर, दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक महीने में 6 आतंकवादी मार गिराए

श्रीनगर. दक्षिण कश्मीर के शोपियां में सुरक्षाबलों ने बुधवार सुबह एनकाउंटर में दो आतंकवादियों को मार गिराया। सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को इनके मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली। इसके बाद, एक संयुक्त अभियान चलाया गया।

पुलिस ने बताया कि ऑपरेशन अभी जारी है। दो और आतंकवादियों को घेर लिया गया है। पिछले एक महीने में दक्षिण कश्मीर में छह आतंकवादियों को मार गिराया गया है।

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सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को आतंकवादियों के शोपियां के पास मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली थी। -फाइल फोटो

source https://www.bhaskar.com/national/news/two-terrorists-killed-in-operation-melahura-shopian-jammu-and-kashmir-127217731.html

शोपियां में आज दो आतंकी एनकाउंटर में ढेर, दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक महीने में 6 आतंकवादी मार गिराए श्रीनगर. दक्षिण कश्मीर के शोपियां में सुरक्षाबलों ने बुधवार सुबह एनकाउंटर में दो आतंकवादियों को मार गिराया। सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को इनके मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली। इसके बाद, एक संयुक्त अभियान चलाया गया। पुलिस ने बताया कि ऑपरेशन अभी जारी है। दो और आतंकवादियों को घेर लिया गया है। पिछले एक महीने में दक्षिण कश्मीर में छह आतंकवादियों को मार गिराया गया है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को आतंकवादियों के शोपियां के पास मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली थी। -फाइल फोटो source https://www.bhaskar.com/national/news/two-terrorists-killed-in-operation-melahura-shopian-jammu-and-kashmir-127217731.html

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शोपियां में आज दो आतंकी एनकाउंटर में ढेर, दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक महीने में 6 आतंकवादी मार गिराए श्रीनगर. दक्षिण कश्मीर के शो...
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शोपियां में आज दो आतंकी एनकाउंटर में ढेर, दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक महीने में 6 आतंकवादी मार गिराए

श्रीनगर. दक्षिण कश्मीर के शोपियां में सुरक्षाबलों ने बुधवार सुबह एनकाउंटर में दो आतंकवादियों को मार गिराया। सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को इनके मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली। इसके बाद, एक संयुक्त अभियान चलाया गया।

पुलिस ने बताया कि ऑपरेशन अभी जारी है। दो और आतंकवादियों को घेर लिया गया है। पिछले एक महीने में दक्षिण कश्मीर में छह आतंकवादियों को मार गिराया गया है।

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शोपियां में आज दो आतंकी एनकाउंटर में ढेर, दक्षिण कश्मीर में सुरक्षाबलों ने एक महीने में 6 आतंकवादी मार गिराए श्रीनगर. दक्षिण कश्मीर के शोपियां में सुरक्षाबलों ने बुधवार सुबह एनकाउंटर में दो आतंकवादियों को मार गिराया। सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को इनके मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली। इसके बाद, एक संयुक्त अभियान चलाया गया। पुलिस ने बताया कि ऑपरेशन अभी जारी है। दो और आतंकवादियों को घेर लिया गया है। पिछले एक महीने में दक्षिण कश्मीर में छह आतंकवादियों को मार गिराया गया है। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें सेना और पुलिस के सूत्रों ने बताया कि मंगलवार की शाम को आतंकवादियों के शोपियां के पास मालहुरा जानपोरा गांव में छिपे होने की जानकारी मिली थी। -फाइल फोटो source /national/news/two-terrorists-killed-in-operation-melahura-shopian-jammu-and-kashmir-127217731.html

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रोजी छूटने पर किसी ने बच्चों का पेट भरने के लिए कई दिनों तक आधी सूखी रोटी दी, तो किसी ने पानी में आटा घोलकर पिलाया

(दिल्ली से अमित कुमार निरंजन, पटना से नीतीश कुमार सोनी और आलोक द्विवेदी)कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देशभर में लॉकडाउन किया गया है। लेकिन, ये लॉकडाउन उन लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है, जो रोज कमाकर अपना और परिवार का पेट भरते हैं। किसी के लिएरोजी छूटने की वजह से बच्चों का पेट भरना मुश्किल हो गया तो किसी ने नन्हें-मुन्नों को पानी में आटा घोलकर पिलाया, क्योंकि उनके लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाया।

दिल्ली: घर का मुखिया बीमार, खाने के पैसे नहीं, ऑपेरशन कैसे कराएंगे

यमुनापार के कंजासा गांव में एक परिवार है, जिसका मुखिया42 वर्षीय बसंतलाल बालू मजदूरी कर तीन बेटियों और तीन बेटों का भरण पोषण करता है। इलाके में चार माह से बालू खनन बंद है। बसंतलाल की तबीयत बिगड़ी। जांच कराने पर फेफड़े में सड़न निकली। ऑपरेशन का खर्च एक लाख रुपए बताया गया। पत्नी सुमन कहती है कि 15 दिन पहले जन्मे बेटे तक के लिए छाती में दूध नहीं आ रहा तो इसके पिता का ऑपरेशन कहां से कराएंगे। पूरा परिवार भुखमरी की कगार पर है। अब कन्हैया चैरिटेबल ट्रस्ट ने उसके परिवार के खाने-पीने की सामग्री और आर्थिक मदद का इंतजाम किया है।

हैदराबाद- आधी सूखी रोटी और पानी-शकर के घोल से भरा पेट

कर्नाटक के गुलबर्गा की रहने वाली सलीमा घर में झाड़ू-पोंछा करती थीं, लेकिन लॉट काडाउन में वो सब छूट गया।

सलीमा कुमारुल्लू और इलप्पा कुमारुल्लू कर्नाटक के गुलबर्गा के रहने वाले हैं। सलीमा नेबताया, 'मैं हैदराबाद में लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करतीहूं। पति पत्थर तोड़ते हैं। दो बच्चे हैं और घर में 8 सदस्य हैं। लॉकडाउन होने पर काम बंद हो गया। सरकारी मदद भी नहीं मिली, तो मैं पहले उन घरों में गई जहां झाड़ू-पाेंछा लगाती थी। मालिक बाहर ही खाना पैकेट में बांधकर फेंक देते थे। कुछ दिन बाद वह भी मिलना बंद हो गया। पांच-छह दिन भूखे रहे। बच्चों काे शकर-पानी का घोल देकर पेट भरते थे। कुछ दिन बाद एक एनजीओ से एक किलो ज्वार का आटा मिला। उससे 12 रोटी बन गईं। सबने आधी-आधी रोटी रोज खाई। रोटी खराब न हो इसलिए उसे सुखा लेते थे और पानी के साथ खा जाते थे। अब एनजीओ ह्यूमनडेवलपमेंट सोसाइटी से मदद मिल रही है।"

पटना-बच्चों को दूध नहीं मिल पा रहा, आटे का घाेल दे रहे

संदीप कुमार और सोनी देवी ने बच्चों का पेट भरने के लिए उन्हें पानी में आटा घोलकर दिया।

ठेला चलाकर परिवार पालने वाले यमुना बिहार कॉलोनी के संदीप कुमार बताते हैं-घर में लॉकडाउन से भुखमरी की नौबत आ गई है। घर में रखा पैसा भी एक सप्ताह बाद ही खत्म हो गया। ऐसे में आटा बचा है। परिवार के सब सदस्य एक वक्त सूखी रोटी खाकर जिंदा रहे। 3 वर्षीय बेटा सचिन दूध मांगता है, तो मां सोनी देवी उसे आटे के घोल में शकर मिलाकर पिला देती हैं। 3 दिन से सभी शाम को पानी पीकर पेट भर रहे हैं।
यही हाल पुनाई चक के राजीव रजक का है। राजीव कपड़े इस्तरी कर सात बच्चों सहित 11 लोगों का पेट पालता है। एक सप्ताह तक सब्जी वालों की फेंकी सब्जी और चावल से गुजारा करते रहे। अब संस्थाओं से दिए जाने वाले भोजन पैकेट पर निर्भर हैं।

नई दिल्ली-कूड़े से फल के टुकड़े बीनकर बच्चों की भूख मिटाई

गाजियाबाद में रहने वाले अफाक ने बताया कि प्रशासन से मिला 3 किलो चावल और आटा 3 दिन ही चल पाया।

मोहम्मद अफाक गाजियाबाद के कौशाम्बी के करीब बहोआपुर गांव में झुग्गी बस्ती में रह रहे हैं। वे बताते हैं, "आम दिनों में कबाड़ बीनकर सात लोगों का पेट भरता था। लाॅकडाउन से जिंदगी बदल गई। राशन और पैसे दो-तीन दिन में खत्म हो गया। शुरुआत में प्रशासन से 3 किलो चावल और 3 किलो आटा मिला। इससे 3 दिन ही पेट भर सका। कुछ एनजीओ वाले बिस्कुट के पैकेट दे गए। इस तरह दो हफ्ते गुजर गए। चार-पांच दिन तक हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था। हमारी झुग्गी से कुछ लोग सोसाइटियों में घरों से कूड़ा इकट्ठा करने जाते थे। उन कूड़ों में मैंने खाने के लिए खोजना शुरू किया। उसमें सेब, संतरा, केले के टुकड़े मिल जाते थे। यही खाकर बच्चों ने कुछ दिन गुजारे। अब नो टियर फाउंडेशन ट्रस्ट के हुसैन तकवी मदद कर रहे हैं।"

पटना-85 वर्षीय रमसखिया खाना लाने चलती है 4 किमी

रमसखिया चलने-फिरने से मजबूर हैं, फिर भी पेट भरने के लिए 3-4 किलोमीटर एक स्कूल तक जाती हैं, जहां से खाना मिलता है।

वर्षीय रमसखिया देवी ठीक से देख नहीं पातीं। बुढ़ापे की कमजोरी ऐसी कि खड़ी तक नहीं हो पातीं। अन्य परेशानी भी हैं,पर दवा-इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। चैरिटी के भोजन से पेट भर रहा है। इसके लिए चिलचिलाती धूप में रोज3-4किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। शेखपुरा चमरटोली निवासी रमसखिया दिन में ही शास्त्रीनगर थाने के सामने स्कूल परिसर में आ जाती है औरदोनों वक्त का खाना लेकर लाैट जाती है। अपने साथ ही पति जुगेश्वर रविदास की भी चिंता है। स्कूल की बाउंड्री की छांव में बैठी रमसखिया ने आपबीती सुनाई। बताया-3बेटियों के साथ एक बेटा है। सभी शादीशुदा हैं, पर देखभाल वाला कोई नहीं। दो साल पहले बेटा अलग हो गया। ऐसे में वृद्ध दंपती दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं।

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दिल्ली में रहने वाले 42 वर्षीय बसंतलाल बालू मजदूरी कर तीन बेटियों और तीन बेटों का पेट पालते थे। काम भी अब बंद है और बंसतलाल बीमार भी हैं।

source https://www.bhaskar.com/national/news/after-giving-a-living-someone-gave-half-a-dry-bread-for-several-days-to-fill-the-stomach-of-the-children-then-someone-dissolved-it-in-water-and-fed-it-127214674.html

रोजी छूटने पर किसी ने बच्चों का पेट भरने के लिए कई दिनों तक आधी सूखी रोटी दी, तो किसी ने पानी में आटा घोलकर पिलाया (दिल्ली से अमित कुमार निरंजन, पटना से नीतीश कुमार सोनी और आलोक द्विवेदी)कोरोनावायरस के संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए देशभर में लॉकडाउन किया गया है। लेकिन, ये लॉकडाउन उन लोगों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा है, जो रोज कमाकर अपना और परिवार का पेट भरते हैं। किसी के लिएरोजी छूटने की वजह से बच्चों का पेट भरना मुश्किल हो गया तो किसी ने नन्हें-मुन्नों को पानी में आटा घोलकर पिलाया, क्योंकि उनके लिए दूध की व्यवस्था नहीं कर पाया। दिल्ली: घर का मुखिया बीमार, खाने के पैसे नहीं, ऑपेरशन कैसे कराएंगे यमुनापार के कंजासा गांव में एक परिवार है, जिसका मुखिया42 वर्षीय बसंतलाल बालू मजदूरी कर तीन बेटियों और तीन बेटों का भरण पोषण करता है। इलाके में चार माह से बालू खनन बंद है। बसंतलाल की तबीयत बिगड़ी। जांच कराने पर फेफड़े में सड़न निकली। ऑपरेशन का खर्च एक लाख रुपए बताया गया। पत्नी सुमन कहती है कि 15 दिन पहले जन्मे बेटे तक के लिए छाती में दूध नहीं आ रहा तो इसके पिता का ऑपरेशन कहां से कराएंगे। पूरा परिवार भुखमरी की कगार पर है। अब कन्हैया चैरिटेबल ट्रस्ट ने उसके परिवार के खाने-पीने की सामग्री और आर्थिक मदद का इंतजाम किया है। हैदराबाद- आधी सूखी रोटी और पानी-शकर के घोल से भरा पेट कर्नाटक के गुलबर्गा की रहने वाली सलीमा घर में झाड़ू-पोंछा करती थीं, लेकिन लॉट काडाउन में वो सब छूट गया। सलीमा कुमारुल्लू और इलप्पा कुमारुल्लू कर्नाटक के गुलबर्गा के रहने वाले हैं। सलीमा नेबताया, 'मैं हैदराबाद में लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा करतीहूं। पति पत्थर तोड़ते हैं। दो बच्चे हैं और घर में 8 सदस्य हैं। लॉकडाउन होने पर काम बंद हो गया। सरकारी मदद भी नहीं मिली, तो मैं पहले उन घरों में गई जहां झाड़ू-पाेंछा लगाती थी। मालिक बाहर ही खाना पैकेट में बांधकर फेंक देते थे। कुछ दिन बाद वह भी मिलना बंद हो गया। पांच-छह दिन भूखे रहे। बच्चों काे शकर-पानी का घोल देकर पेट भरते थे। कुछ दिन बाद एक एनजीओ से एक किलो ज्वार का आटा मिला। उससे 12 रोटी बन गईं। सबने आधी-आधी रोटी रोज खाई। रोटी खराब न हो इसलिए उसे सुखा लेते थे और पानी के साथ खा जाते थे। अब एनजीओ ह्यूमनडेवलपमेंट सोसाइटी से मदद मिल रही है।" पटना-बच्चों को दूध नहीं मिल पा रहा, आटे का घाेल दे रहे संदीप कुमार और सोनी देवी ने बच्चों का पेट भरने के लिए उन्हें पानी में आटा घोलकर दिया। ठेला चलाकर परिवार पालने वाले यमुना बिहार कॉलोनी के संदीप कुमार बताते हैं-घर में लॉकडाउन से भुखमरी की नौबत आ गई है। घर में रखा पैसा भी एक सप्ताह बाद ही खत्म हो गया। ऐसे में आटा बचा है। परिवार के सब सदस्य एक वक्त सूखी रोटी खाकर जिंदा रहे। 3 वर्षीय बेटा सचिन दूध मांगता है, तो मां सोनी देवी उसे आटे के घोल में शकर मिलाकर पिला देती हैं। 3 दिन से सभी शाम को पानी पीकर पेट भर रहे हैं। यही हाल पुनाई चक के राजीव रजक का है। राजीव कपड़े इस्तरी कर सात बच्चों सहित 11 लोगों का पेट पालता है। एक सप्ताह तक सब्जी वालों की फेंकी सब्जी और चावल से गुजारा करते रहे। अब संस्थाओं से दिए जाने वाले भोजन पैकेट पर निर्भर हैं। नई दिल्ली-कूड़े से फल के टुकड़े बीनकर बच्चों की भूख मिटाई गाजियाबाद में रहने वाले अफाक ने बताया कि प्रशासन से मिला 3 किलो चावल और आटा 3 दिन ही चल पाया। मोहम्मद अफाक गाजियाबाद के कौशाम्बी के करीब बहोआपुर गांव में झुग्गी बस्ती में रह रहे हैं। वे बताते हैं, "आम दिनों में कबाड़ बीनकर सात लोगों का पेट भरता था। लाॅकडाउन से जिंदगी बदल गई। राशन और पैसे दो-तीन दिन में खत्म हो गया। शुरुआत में प्रशासन से 3 किलो चावल और 3 किलो आटा मिला। इससे 3 दिन ही पेट भर सका। कुछ एनजीओ वाले बिस्कुट के पैकेट दे गए। इस तरह दो हफ्ते गुजर गए। चार-पांच दिन तक हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं था। हमारी झुग्गी से कुछ लोग सोसाइटियों में घरों से कूड़ा इकट्ठा करने जाते थे। उन कूड़ों में मैंने खाने के लिए खोजना शुरू किया। उसमें सेब, संतरा, केले के टुकड़े मिल जाते थे। यही खाकर बच्चों ने कुछ दिन गुजारे। अब नो टियर फाउंडेशन ट्रस्ट के हुसैन तकवी मदद कर रहे हैं।" पटना-85 वर्षीय रमसखिया खाना लाने चलती है 4 किमी रमसखिया चलने-फिरने से मजबूर हैं, फिर भी पेट भरने के लिए 3-4 किलोमीटर एक स्कूल तक जाती हैं, जहां से खाना मिलता है। वर्षीय रमसखिया देवी ठीक से देख नहीं पातीं। बुढ़ापे की कमजोरी ऐसी कि खड़ी तक नहीं हो पातीं। अन्य परेशानी भी हैं,पर दवा-इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। चैरिटी के भोजन से पेट भर रहा है। इसके लिए चिलचिलाती धूप में रोज3-4किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। शेखपुरा चमरटोली निवासी रमसखिया दिन में ही शास्त्रीनगर थाने के सामने स्कूल परिसर में आ जाती है औरदोनों वक्त का खाना लेकर लाैट जाती है। अपने साथ ही पति जुगेश्वर रविदास की भी चिंता है। स्कूल की बाउंड्री की छांव में बैठी रमसखिया ने आपबीती सुनाई। बताया-3बेटियों के साथ एक बेटा है। सभी शादीशुदा हैं, पर देखभाल वाला कोई नहीं। दो साल पहले बेटा अलग हो गया। ऐसे में वृद्ध दंपती दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें दिल्ली में रहने वाले 42 वर्षीय बसंतलाल बालू मजदूरी कर तीन बेटियों और तीन बेटों का पेट पालते थे। काम भी अब बंद है और बंसतलाल बीमार भी हैं। source https://www.bhaskar.com/national/news/after-giving-a-living-someone-gave-half-a-dry-bread-for-several-days-to-fill-the-stomach-of-the-children-then-someone-dissolved-it-in-water-and-fed-it-127214674.html

April 21, 2020 0 Comments
रोजी छूटने पर किसी ने बच्चों का पेट भरने के लिए कई दिनों तक आधी सूखी रोटी दी, तो किसी ने पानी में आटा घोलकर पिलाया (दिल्ली से अमित कुमार न...
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8 साल की बच्ची ने पूछा- लोग भूखे क्यों हैं! एमपी के किसान पिता ने ट्रॉली भर गेहूं दान कर दिया

कोरोना के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक किसान ने अपने सीमित संसाधनों से नई पहल की है। मंदसौर के झावल के किसान कैलाश गुर्जर ने जरूरतमंदों के लिए एक ट्रॉली गेहूं प्रशासन को दिया है। साथ ही देशभर के किसानों से भी अपील की है कि वे भी एक क्विंटल गेहूं में से एक किलो दान करें, ताकि इस संकट की घड़ी में देश में कोई भी भूखा ना रहे। कैलाश गुर्जर ने यह पहल अपनी 8 साल की बेटी से प्रेरणा पाकर की है। उनके फैसले का सम्मान करते हुए सांसद, विधायक और किसान नेताओं ने भी ऐसी ही अपील देशभर के किसानों से की है।

बेटी ने कहा था- न जाने कितने परिवार भूखे होंगे

गुर्जर ने बताया कि एक दिन एक छोटी बच्ची उनके घर रोटी मांगने लगी। उनकी 8 साल की बेटी ने उसे रोटी और बिस्किट दिए। किसान ने रोटी मांगने वाली बच्ची से परिवार के बारे में पूछा। उसने बताया घर में माता-पिता और भाई सभी भूखे हैं। इस पर किसान ने घर से ही आटा, दाल और चावल दिए। गुर्जर की बेटी ने कहा - न जाने कितने परिवार भूखे होंगे। इसके बाद गुर्जर ने कलेक्टर से संपर्क कर एक ट्रॉली गेहूं दान कर दिया। गुर्जर नेकिसानों से अपील की है कि वे मंडी में गेहूं बेचने जाएं तो प्रति क्विंटल से एक किलो गेहूं जरूरतमंदों के लिए दान करें ताकि इस संकट की घड़ी में लोगों की मदद हो सके।

यूपी के किसान ने पूरी फसल पीएम राहत कोष में दान दी

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक किसान ने 223 क्विंटल गेहूं की पूरी फसल प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर दी। बड़ौदा के निवासी धर्मेंद्र सिंह लाठर ने गुलरिया चकझाऊ गांव में 12 एकड़ जमीन खरीदी थी। यह उनकी पहली फसल थी। किसान का कहना है कि इस गेहूं से इलाके के सैकड़ों लोगों का पेट भर सकेगा। खास बात यह है कि लॉकडाउन के कारण वे गुजरात से आ नहीं सके तो अपने भाई को गेहूं लेकर मंडी भेजा।

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मंदसौर के किसान कैलाश की 8 साल की बेटी, जिसने पिता से पूछा था कि लोग भूखे क्यों हैं।

source https://www.bhaskar.com/national/news/8-year-old-girl-asked-why-are-people-hungry-the-farmer-father-of-mp-donated-a-trolley-full-of-wheat-127214675.html

8 साल की बच्ची ने पूछा- लोग भूखे क्यों हैं! एमपी के किसान पिता ने ट्रॉली भर गेहूं दान कर दिया कोरोना के खिलाफ चल रही लड़ाई में एक किसान ने अपने सीमित संसाधनों से नई पहल की है। मंदसौर के झावल के किसान कैलाश गुर्जर ने जरूरतमंदों के लिए एक ट्रॉली गेहूं प्रशासन को दिया है। साथ ही देशभर के किसानों से भी अपील की है कि वे भी एक क्विंटल गेहूं में से एक किलो दान करें, ताकि इस संकट की घड़ी में देश में कोई भी भूखा ना रहे। कैलाश गुर्जर ने यह पहल अपनी 8 साल की बेटी से प्रेरणा पाकर की है। उनके फैसले का सम्मान करते हुए सांसद, विधायक और किसान नेताओं ने भी ऐसी ही अपील देशभर के किसानों से की है। बेटी ने कहा था- न जाने कितने परिवार भूखे होंगे गुर्जर ने बताया कि एक दिन एक छोटी बच्ची उनके घर रोटी मांगने लगी। उनकी 8 साल की बेटी ने उसे रोटी और बिस्किट दिए। किसान ने रोटी मांगने वाली बच्ची से परिवार के बारे में पूछा। उसने बताया घर में माता-पिता और भाई सभी भूखे हैं। इस पर किसान ने घर से ही आटा, दाल और चावल दिए। गुर्जर की बेटी ने कहा - न जाने कितने परिवार भूखे होंगे। इसके बाद गुर्जर ने कलेक्टर से संपर्क कर एक ट्रॉली गेहूं दान कर दिया। गुर्जर नेकिसानों से अपील की है कि वे मंडी में गेहूं बेचने जाएं तो प्रति क्विंटल से एक किलो गेहूं जरूरतमंदों के लिए दान करें ताकि इस संकट की घड़ी में लोगों की मदद हो सके। यूपी के किसान ने पूरी फसल पीएम राहत कोष में दान दी उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक किसान ने 223 क्विंटल गेहूं की पूरी फसल प्रधानमंत्री राहत कोष में दान कर दी। बड़ौदा के निवासी धर्मेंद्र सिंह लाठर ने गुलरिया चकझाऊ गांव में 12 एकड़ जमीन खरीदी थी। यह उनकी पहली फसल थी। किसान का कहना है कि इस गेहूं से इलाके के सैकड़ों लोगों का पेट भर सकेगा। खास बात यह है कि लॉकडाउन के कारण वे गुजरात से आ नहीं सके तो अपने भाई को गेहूं लेकर मंडी भेजा। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें मंदसौर के किसान कैलाश की 8 साल की बेटी, जिसने पिता से पूछा था कि लोग भूखे क्यों हैं। source https://www.bhaskar.com/national/news/8-year-old-girl-asked-why-are-people-hungry-the-farmer-father-of-mp-donated-a-trolley-full-of-wheat-127214675.html

April 21, 2020 0 Comments
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ब्रिटेन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर रोज 10 हजार यात्री आ रहे; स्क्रीनिंग नहीं हो रही, विशेषज्ञ बोले- इससे परेशानी और बढ़ेगी

कोरोनावायरस से जूझ रहे ब्रिटेन के हॉटस्पॉट लंदन में विदेश से आने वाले यात्रियों से पूछताछ नहीं की जा रही है। न ही उनकी स्क्रीनिंग हो रही है। सोमवार को तेहरान से लौटे ब्रिटिश-ईरानी कारोबारी फरजाद पारिजकर यह देखकर हैरान थे कि उनका मास्क पूरी तरह से उनके मुंह को ढंक भी नहीं पा रहा था। पर वे बिना रोक-टोक के हीथ्रो एयरपोर्ट के टर्मिनल से बाहर आ गए। जबकि तेहरान एयरपोर्ट पर फ्लाइट में सवार होने से पहले लेजर बीम थर्मामीटर से उनका तापमान लिया गया था।

उन्हें एक फॉर्म भी भरने के लिए कहा गया। इसमें पता, नागरिकता, यात्रा की वजह, कोरोना के लक्षणों की जानकारी मांगी गई थी। लंदन आ रही फ्लाइट के सभी 80 यात्रियों को यह फॉर्म भरना पड़ा। पर यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था कि सब सामान्य है।यह सिर्फ ईरान के यात्रियों के साथ नहीं हुआ, रोजाना एयरपोर्ट पर 10 हजार यात्री ऐसे ही पहुंच रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने माना- 15 हजार यात्री लंदन आ रहे
ब्रिटेन के स्वाथ्य मंत्री मैट हैंकॉक ने एक इंटरव्यू में माना था कि लंदन में 15 हजार यात्री रोजाना आ-जा रहे हैं। इनमें 10 हजार तो हीथ्रो से ही ट्रेैवल कर रहे हैं। बाकी गैटविक, मैनचेस्टर और बर्मिंघम एयरपोर्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां तेहरान, न्यूयॉर्क, लॉस एंजेलिस, शिकागो, वॉशिंगटन और डलास से उड़ानें पहुंच रही हैं। विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि कोरोना प्रभावितशहरों से आ रहे लोगों से ब्रिटेन की परेशानी और बढ़ेगी।

सरकार का तर्क: यात्री घट गए, इसलिए स्क्रीनिंग की जरूरत नहीं

लंदन में इटली, फ्रांस और जापान से भी उड़ानें पहुंच रही हैं। हीथ्रो एयरपोर्ट ने बताया कि एयरपोर्ट खुला रखने का उद्देश्य दुनियाभर में फंसे ब्रिटिश नागरिकों को वापस लाने में मदद करना, मेडिकल उपकरण और खाने की चीजें मंगाना है। हालांकि, इस दौरान लोगों की ‌आवाजाही 75% तक घटी है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बाहर से आ रहे लोगों की स्क्रीनिंग तो होनी ही चाहिए। सरकार का तर्क है कि महामारी के इस दौर में स्क्रीनिंग का बहुत महत्व नहीं रह जाता। हैन्कॉक के मुताबिक एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि यात्री वैसे ही घट गए हैं।

ब्रिटेन में फंसे भारतीय डॉक्टर बोले- हमारी जरूरत देश में ज्यादा

भारतीय मूल के कई डॉक्टर इन दिनों ब्रिटेन में फंसे हुए हैं। दरअसल भारत और दूसरे कई देशों से हर साल सैकड़ों डॉक्टर प्रोफेशनल एंड लिंग्वस्टिक असेसमेंट बोर्ड का टेस्ट देने ब्रिटेन जाते हैं। ये इस टेस्ट का दूसरा भाग होता है। पहला भाग अपने ही देश में देना पड़ता है और पास करना पड़ता है। पास होने वाले डॉक्टर ब्रिटेन एनएचएस में काम करने के योग्य हो जाते हैं। इस बार भी बड़ी संख्या में भारत से डॉक्टर गए थे। कोलकाता की डॉक्टर अनीशा अमीन काकहना था कि मेरी जरूरत भारत में ज्यादा है।

कर्नाटक के अभिषेक भट्‌टाचार्य ने बताया कि अगर मैं इस वक्त देश में होता तो बहुत सारे लोगों की मदद कर सकता था। भारतीय मूल की मनोचिकित्सक राका मोइत्रा ने युवा भारतीय डॉक्टरों के बारे में सबसे पहले लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडियन ओरिजिन (बापियो) और ब्रिटिश इंटरनेशनल डॉक्टर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों के जरिए उनकी रहने संबंधी और अन्य मदद की।

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कोरोना के हॉटस्पॉट लंदन में विदेश से आने वाले यात्रियों से कोई पूछताछ नहीं की जा रही है।

source https://www.bhaskar.com/international/news/britains-heathrow-airport-has-10000-passengers-arriving-daily-not-screening-experts-said-this-will-increase-the-problem-127214676.html

ब्रिटेन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर रोज 10 हजार यात्री आ रहे; स्क्रीनिंग नहीं हो रही, विशेषज्ञ बोले- इससे परेशानी और बढ़ेगी कोरोनावायरस से जूझ रहे ब्रिटेन के हॉटस्पॉट लंदन में विदेश से आने वाले यात्रियों से पूछताछ नहीं की जा रही है। न ही उनकी स्क्रीनिंग हो रही है। सोमवार को तेहरान से लौटे ब्रिटिश-ईरानी कारोबारी फरजाद पारिजकर यह देखकर हैरान थे कि उनका मास्क पूरी तरह से उनके मुंह को ढंक भी नहीं पा रहा था। पर वे बिना रोक-टोक के हीथ्रो एयरपोर्ट के टर्मिनल से बाहर आ गए। जबकि तेहरान एयरपोर्ट पर फ्लाइट में सवार होने से पहले लेजर बीम थर्मामीटर से उनका तापमान लिया गया था। उन्हें एक फॉर्म भी भरने के लिए कहा गया। इसमें पता, नागरिकता, यात्रा की वजह, कोरोना के लक्षणों की जानकारी मांगी गई थी। लंदन आ रही फ्लाइट के सभी 80 यात्रियों को यह फॉर्म भरना पड़ा। पर यहां ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। ऐसा लग रहा था कि सब सामान्य है।यह सिर्फ ईरान के यात्रियों के साथ नहीं हुआ, रोजाना एयरपोर्ट पर 10 हजार यात्री ऐसे ही पहुंच रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने माना- 15 हजार यात्री लंदन आ रहे ब्रिटेन के स्वाथ्य मंत्री मैट हैंकॉक ने एक इंटरव्यू में माना था कि लंदन में 15 हजार यात्री रोजाना आ-जा रहे हैं। इनमें 10 हजार तो हीथ्रो से ही ट्रेैवल कर रहे हैं। बाकी गैटविक, मैनचेस्टर और बर्मिंघम एयरपोर्ट का इस्तेमाल कर रहे हैं। यहां तेहरान, न्यूयॉर्क, लॉस एंजेलिस, शिकागो, वॉशिंगटन और डलास से उड़ानें पहुंच रही हैं। विशेषज्ञों ने चिंता जताई है कि कोरोना प्रभावितशहरों से आ रहे लोगों से ब्रिटेन की परेशानी और बढ़ेगी। सरकार का तर्क: यात्री घट गए, इसलिए स्क्रीनिंग की जरूरत नहीं लंदन में इटली, फ्रांस और जापान से भी उड़ानें पहुंच रही हैं। हीथ्रो एयरपोर्ट ने बताया कि एयरपोर्ट खुला रखने का उद्देश्य दुनियाभर में फंसे ब्रिटिश नागरिकों को वापस लाने में मदद करना, मेडिकल उपकरण और खाने की चीजें मंगाना है। हालांकि, इस दौरान लोगों की ‌आवाजाही 75% तक घटी है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बाहर से आ रहे लोगों की स्क्रीनिंग तो होनी ही चाहिए। सरकार का तर्क है कि महामारी के इस दौर में स्क्रीनिंग का बहुत महत्व नहीं रह जाता। हैन्कॉक के मुताबिक एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग की जरूरत इसलिए नहीं है, क्योंकि यात्री वैसे ही घट गए हैं। ब्रिटेन में फंसे भारतीय डॉक्टर बोले- हमारी जरूरत देश में ज्यादा भारतीय मूल के कई डॉक्टर इन दिनों ब्रिटेन में फंसे हुए हैं। दरअसल भारत और दूसरे कई देशों से हर साल सैकड़ों डॉक्टर प्रोफेशनल एंड लिंग्वस्टिक असेसमेंट बोर्ड का टेस्ट देने ब्रिटेन जाते हैं। ये इस टेस्ट का दूसरा भाग होता है। पहला भाग अपने ही देश में देना पड़ता है और पास करना पड़ता है। पास होने वाले डॉक्टर ब्रिटेन एनएचएस में काम करने के योग्य हो जाते हैं। इस बार भी बड़ी संख्या में भारत से डॉक्टर गए थे। कोलकाता की डॉक्टर अनीशा अमीन काकहना था कि मेरी जरूरत भारत में ज्यादा है। कर्नाटक के अभिषेक भट्‌टाचार्य ने बताया कि अगर मैं इस वक्त देश में होता तो बहुत सारे लोगों की मदद कर सकता था। भारतीय मूल की मनोचिकित्सक राका मोइत्रा ने युवा भारतीय डॉक्टरों के बारे में सबसे पहले लोगों का ध्यान आकर्षित किया। इसके बाद ब्रिटिश एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडियन ओरिजिन (बापियो) और ब्रिटिश इंटरनेशनल डॉक्टर्स एसोसिएशन जैसे संगठनों के जरिए उनकी रहने संबंधी और अन्य मदद की। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें कोरोना के हॉटस्पॉट लंदन में विदेश से आने वाले यात्रियों से कोई पूछताछ नहीं की जा रही है। source https://www.bhaskar.com/international/news/britains-heathrow-airport-has-10000-passengers-arriving-daily-not-screening-experts-said-this-will-increase-the-problem-127214676.html

April 21, 2020 0 Comments
ब्रिटेन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर रोज 10 हजार यात्री आ रहे; स्क्रीनिंग नहीं हो रही, विशेषज्ञ बोले- इससे परेशानी और बढ़ेगी कोरोनावायरस से जूझ र...
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