राजधानी में कोरोना इंफेक्शन के चलते हर किसी को शक की नजर से देखा जा रहा है। अस्पताल में होने वाली करीब-करीब हर मौत को संदिग्ध मानकर उसका कोरोना टेस्ट कराया जाता है। टेस्ट की रिपोर्ट आने में देर होने की वजह से नॉन कोविड मरीज के परिजनों को डेडबॉडी लेने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। परिजनों को 10-12 दिन तक डेडबॉडी लेने में लग रहे हैं। परिजन अस्पताल के चक्कर लगा-लगाकर थक जाते हैं लेकिन उन्हें डेडबॉडी नहीं मिलती। कुछ अस्पतालों में हुई नॉन कोविड मरीजों की डेडबॉडी मिलने में होने वाली परेशानी के बारे में भास्कर ने बात की...।
जानिए... लॉकडाउन में लोगों को कैसे परेशानियों का करना पड़ रहा सामना
- पिता की 27 अप्रैल को हुई मौत, शव 3 मई को मिला
शास्त्री नगर में रहने वाले ऑटो चालक राजू सोनकर की मौत 27 अप्रैल को मॉडल टाउन के एक निजी अस्पताल में हुई थी। डेडबॉडी की कोरोना जांच के लिए बाबू जगजीवन राम अस्पताल भेज दी। परिजन डेडबॉडी लेने के लिए रोज अस्पताल के चक्कर लगाते रहे लेकिन उन्हें पूरे एक सप्ताह बाद डेडबॉडी मिली। राजू के बेटे साहिल ने बताया कि पापा की तबियत खराब हुई तो हम प्राइवेट अस्पताल ले गए। वहां उनकी डेथ हो गई। अस्पताल ने बताया कि उन्हें हार्ट अटैक आया है। मगर अस्पताल ने कोरोना सस्पेक्ट मानकर पुलिस को फोन कर दिया और डेडबॉडी को जांच के लिए भेज दिया। 3 मई को रिपोर्ट आने के बाद शव हमे दिया गया।
- प्रीतम सिंह की डेडबॉडी मिलने में लग गए 11 दिन
रोहिणी में रहने वाले प्रीतम सिंह की मौत 19 अप्रैल को अंबेडकर अस्पताल में हुई थी। इनकी डेडबॉडी मिलने में परिजनों को 11 दिन का वक्त लगा। 29 अप्रैल की रात कोरोना रिपोर्ट निगेटिव आने के बाद 30 अप्रैल को डेडबॉडी परिजनों को सौंपी गई। प्रीतम सिंह के भाई ने बताया कि उनके भाई को ब्लड कैंसर था। तबियत खराब हुई तो अंबेडकर अस्पताल लेकर गए जहां उनकी 19 अप्रैल को मौत हुई। डॉक्टरों ने कहा कि कोरोना की जांच होगी और 2 दिन बाद रिपोर्ट आ जाएगी। 2 दिन बाद हम अस्पताल गए तो बोला पांच दिन बाद आएगी। रोज-राज अस्पताल जाकर हम परेशान हो गए। 29 अप्रैल की रात अस्पताल से फोन आया कि रिपोर्ट निगेटिव आई है।
- मां की 19 अप्रैल को हुई डेथ, 28 को मिला शव
नरेला के ताजपुर में रहने वाली 62 साल की बुजुर्ग राज की तबियत खराब हुई तो परिवार के लोग पास के महाराजा हरिश्चंद्र अस्पताल में लेकर गए। राज की बड़ी बहू ने बताया कि हरिश्चंद्रअस्पताल से हमें अंबेडकर अस्पताल रेफर कर दिया। 19 अप्रैल को माता जी की मौत हो गई और 28 अप्रैल को डेडबॉडी हमें दी। पूरे 10 दिन हम परेशान रहे। गांव के लोग भी तरह-तरह की बात कर रहे थे कि ये तो कोरोना निकलेगी या कुछ और। दुख में भी लोगों ने हमसे दूरी बनाई। मगर रिपोर्ट निगेटिव आई। अस्पताल से प्राइवेट एंबुलेंस कर हम डेडबॉडी अपने घर ले आए। जब तक अंतिम संस्कार नहीं हो गया, घर में मातम जैसी स्थिति थी। रिश्तेदार भी रोज फोन कर-कर के पूछते थे कि क्या हुआ।
- अंतिम संस्कार करा दिया लेकिन नहीं दी रिपोर्ट
भलस्वा इलाके में रहने वाले हफीजुल की पत्नी की मौत 19 अप्रैल को हुई थी। इनकी पत्नी की डेडबॉडी 29 अप्रैल को दी गई और उसे अवंतिका के पास दफन किया गया। यानी इन्हें भी डेडबॉडी मिलने में 10 दिन का वक्त लग गया। हफीजुल ने कहा कि हमें रिपोर्ट के बारे में कुछ नहीं बताया लेकिन दफनाने के लिए एंबुलेंस लेकर गई थी। हफीजुल ने कहा कि मौत के बाद इतने दिन डेडबॉडी देने में लगा दिए, इससे बहुत परेशानी हुई है।
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